पारिवारिक संस्कारों से जनसेवा तक, बस्तर दशहरा में कुमार जयदेव का समर्पण बना चर्चा का विषय
रथ निर्माण के कारीगरों से लेकर माता के भक्तों तक की सेवा में जुटे कुमार जयदेव
जगदलपुर। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहां लोग अक्सर लालच, स्वार्थ और निजी हितों में उलझकर केवल अपने बारे में सोचते नजर आते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने सेवा और समर्पण को ही अपना धर्म और पूजा बना लिया है। कुमार जयदेव इन्हीं में से एक हैं, जिनकी बस्तर दशहरा में कारीगरों और माता के भक्तों के लिए की जा रही सेवा चर्चा का विषय बनी हुई है।
बस्तर दशहरा में रथ निर्माण करने वाले कारीगरों के लिए 50 हजार रुपये की सहायता और प्रतिदिन गर्म नाश्ते की व्यवस्था हो या मावली मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए भोजन सेवा, कुमार जयदेव की ये पहल सेवा और समर्पण की मिसाल पेश कर रही है।
जब मीडिया के साथियों ने उनसे पूछा कि वे इतने लोगों की व्यवस्थाएं किस तरह कर पाते हैं, तो उन्होंने सहज भाव से कहा कि यह सब उनके परिवार के संस्कारों का परिणाम है।
कुमार जयदेव ने बताया कि वे सुकमा जमींदार परिवार से आते हैं। उनके परिवार में लोगों की सेवा करने और उनके सुख-दुख में सहभागी बनने की परंपरा रही है। उन्होंने कहा, “हमारे परिवार के संस्कार ही ऐसे हैं कि हम लोगों की सेवा करें और उनके सुख-दुख में सहभागी बनें। बस्तर दशहरा में तो हमें माता की सेवा का अवसर मिला है। दूर-दूर से लोग माता की सेवा के लिए यहां पहुंचते हैं और हमें भी उनकी सेवा करने का सौभाग्य मिल रहा है। इससे बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है।”
उनके विचारों में सेवा केवल दान या आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं, बल्कि पारिवारिक संस्कारों और धार्मिक आस्था से जुड़ी एक जिम्मेदारी है। बस्तर दशहरा में झारउमरगांव और बेड़ाउमरगांव के कारीगर दिन-रात मेहनत कर रथ निर्माण की परंपरा को जीवंत रखते हैं। उनकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जयदेव ने 50 हजार रुपये की सहायता की घोषणा की और प्रतिदिन सुबह गर्म नाश्ते की व्यवस्था भी करवाई।
इसी तरह, दशहरा पर्व में शामिल होने के लिए दूर-दराज से आने वाले पुजारियों, सिरहा-गुनिया और अन्य श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मावली मंदिर परिसर में पंचमी से माता की विदाई तक भोजन की व्यवस्था की गई है।
कुमार जयदेव की यह पहल संदेश देती है कि सच्ची सेवा केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं होती, बल्कि उन लोगों की मदद करने में भी निहित है, जो अपनी आस्था, श्रम और समर्पण से परंपराओं को जीवंत रखते हैं। भागदौड़ और स्वार्थ के बीच दूसरों के सुख-दुख को अपना समझना ही सेवा के उन संस्कारों की पहचान है, जो समाज को जोड़ते हैं और मानवता को मजबूत बनाते हैं।





