बिलासपुर की 6 वर्षीय तारिणी श्रीवास ने रचा कीर्तिमान, कथक में राष्ट्रीय पुरस्कार जीतकर छत्तीसगढ़ का बढ़ाया गौरव
'शिखर सम्मान' से अलंकृत नृत्याचार्य पं. बर्मनलाल की कला-विरासत चमकी, 6 वर्षीय पड़पोती तारिणी ने राष्ट्रीय मंच पर कथक में रचा इतिहास

बिलासपुर/परसदा: भारतीय शास्त्रीय कला और संगीत केवल एक विधा नहीं बल्कि पीढ़ियों की अटूट साधना, तप और संस्कार की वह पावन सरिता है जो समय के साथ और अधिक निर्मल होकर प्रवाहित होती है। इसी समृद्ध और गौरवशाली परंपरा की दीप्तिमान आभा बिलासपुर के ग्राम परसदा की मात्र 6 वर्षीय बालिका कु. तारिणी श्रीवास के रूप में राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकी है। एलसीआईटी पब्लिक स्कूल बिलासपुर की कक्षा दूसरी की इस नन्ही साधिका ने मध्य प्रदेश के पचमढ़ी में आयोजित गरिमामयी अखिल भारतीय नृत्य-संगीत महोत्सव ‘नर्मदोत्सव’ में कथक की कठिन विधा में प्रथम स्थान अर्जित कर समूचे छत्तीसगढ़ का मस्तक गर्व से ऊंचा किया है।
चार पीढ़ियों का कला-तप: रक्त में समाई है रायगढ़ घराने की थाप
तारिणी की यह असाधारण उपलब्धि केवल एक प्रतियोगिता की विजय नहीं बल्कि उस ऐतिहासिक घराने के संस्कारों का प्रतिफल है जिसने रायगढ़ रियासत की कथक शैली को अमर किया है, ’शिखर सम्मान’ से विभूषित परदादा पं. बर्मनलाल नृत्याचार्य
तारिणी के परदादा स्वर्गीय पंडित बर्मनलाल जी रायगढ़ रियासत के संगीत सम्राट राजा चक्रधर सिंह जी के परम प्रिय शिष्य थे। उन्हें मध्य प्रदेश शासन के सर्वोच्च सांस्कृतिक अलंकरण ‘शिखर सम्मान’ से विभूषित किया गया था। उन्होंने कथक के ताल-पक्ष बोल और भाव को वह ऊंचाई दी जिसकी गूंज आज भी कला जगत में आदर के साथ सुनी जाती है।
दादा स्व. सीताराम श्रीवास की ताल-साधना
पंडित बर्मनलाल जी के सुपुत्र एवं तारिणी के दादा स्वर्गीय सीताराम श्रीवास ने तबला शिक्षक के रूप में जीवनपर्यंत ताल और लय के व्याकरण को संवारा।
परिवार की इस पावन सांस्कृतिक परंपरा को तारिणी की माँ की बड़ी माँ श्रीमती प्रमिला श्रीवास ने मंचों पर जीवंत रखा, जिन्होंने ऐतिहासिक ‘चक्रधर समारोह’ में अपने भाव-नृत्य और कथक प्रस्तुतियों से देशभर के कला पारखियों को चमत्कृत किया है।
पचमढ़ी के भव्य मंच पर गूंजी घुंघरुओं की झंकार
श्री वैष्णव संगीत
महाविद्यालय एवं मधुगुंजन संगीत समिति रायगढ़ द्वारा 2 अक्टूबर को आयोजित ‘नर्मदोत्सव’ के राष्ट्रीय मंच पर देश के कोने-कोने से आए कला साधकों का समागम हुआ था। इस भव्य आयोजन में जब 6 वर्ष की नन्ही तारिणी ने पारंपरिक वेशभूषा में मंच पर कदम रखा तो उनकी सहज पदचाप सधी हुई लयकारी तत्कार और मुखमुद्रा के भाव देखकर पूरा प्रेक्षागृह स्तब्ध रह गया। विद्वान निर्णायकों ने तारिणी की शुद्ध शास्त्रीय शैली लगन और मंच-संयम को परखते हुए उन्हें सर्वसम्मति से ‘कथक’ विधा में प्रथम पुरस्कार प्रदान किया और स्मृति चिन्ह व प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।
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नन्हे कदमों में अमर विरासत, क्षेत्र में गौरव का माहौल
इतनी अल्पायु में शास्त्रीय संगीत के मर्म को आत्मसात कर राष्ट्रीय खिताब जीतना यह दर्शाता है कि महान पूर्वजों का आशीर्वाद और कला के संस्कार किस तरह नई पीढ़ी में प्रस्फुटित होते हैं। तारिणी की इस स्वर्णिम सफलता पर एलसीआईटी पब्लिक स्कूल प्रबंधन शिक्षकों, परिजनों तथा परसदा व बिलासपुर के कला-प्रेमियों में हर्ष की लहर है। सभी ने नन्ही तारिणी के उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना करते हुए कहा कि वह आगे चलकर भारतीय शास्त्रीय नृत्य के आकाश में ध्रुव तारे की तरह जगमगाएंगी।





