कोरबा में शिक्षा व्यवस्था पर करारा प्रहार: 17 साल से फर्जी डिग्री के सहारे बच्चों का भविष्य गढ़ रहा प्रधान पाठक

भूमिका: क्या इसी दिन के लिए गढ़ी गई थी साक्षरता की इबारत?
छत्तीसगढ़ के औद्योगिक और शैक्षणिक रूप से संवेदनशील जिले कोरबा से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जो छत्तीसगढ़ शासन की शिक्षक पात्रता और प्रशासनिक निगरानी की पूरी प्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। एक तरफ राज्य सरकार शिक्षा के स्तर को सुधारने और बच्चों को नैतिक शिक्षा देने के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर कोरबा के एक सरकारी स्कूल में 17 साल से फर्जी अंकसूची के सहारे एक प्रधान पाठक मलाईदार पद पर बैठकर नौनिहालों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है।
सवाल यह है कि जिस शिक्षक की अपनी पूरी नींव ही झूठ और फरेब के कागजों पर टिकी हो, वह मासूम बच्चों को ईमानदारी, सत्य और कर्तव्यनिष्ठा का पाठ कैसे पढ़ा सकता है? प्रशासनिक शिथिलता या मिलीभगत? 17 साल तक आंखें मूंदे क्यों बैठा रहा सिस्टम?
यह कोई सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं है, बल्कि एक गहरी साजिश की बू आ रही है। 17 साल* का लंबा अरसा बीत जाने के बाद भी इस फर्जीवाड़े का पर्दाफाश विभागीय जांच से नहीं, बल्कि एक शिकायतकर्ता की जिद और दस्तावेजों की जंग के बाद सामने आया है। जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर तमाचा:* क्या शिक्षा विभाग के अधिकारियों की नजरों में कभी इस शिक्षक के दस्तावेजों का सत्यापन नहीं हुआ? या फिर फाइलों को दबाने का एक सुनियोजित खेल चल रहा था?
हाई कोर्ट के आदेश की आड़ में खेल: यदि इस मामले में कोई पुराना कानूनी पेंच या हाई कोर्ट का आदेश भी आड़े आया है, तो क्या जिला प्रशासन और विभाग की यह नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे इस गंभीर धोखाधड़ी के खिलाफ पूरी ताकत से कानूनी लड़ाई लड़ें?
अधिकारी वर्ग को यह समझना होगा कि यदि इस तरह के मामलों में लचर पैरवी की गई, तो यह केवल एक व्यक्ति का बचाव नहीं होगा, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यकुशलता पर एक बदनुमा दाग होगा।
शिक्षक समाज के माथे पर कलंक
शिक्षक को समाज का निर्माता और मार्गदर्शक कहा जाता है। लेकिन जब एक प्रधान पाठक ही फर्जी दस्तावेजों के जरिए नौकरी हासिल कर बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेलता है, तो यह पूरे शिक्षक समाज के लिए आत्ममंथन और आत्मग्लानि का विषय बन जाता है।
* *शर्मनाक सच:* जो शिक्षक खुद कागजी जालसाजी के सहारे कुर्सी पर बैठा हो, वह किस मुंह से कक्षा में खड़े होकर बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाएगा?
छात्रों के साथ विश्वासघात: 17 साल के कार्यकाल के दौरान इस शिक्षक ने सैकड़ों बच्चों के भविष्य को दिशा देने के बजाय उनके साथ एक बड़ा धोखा किया है।
जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के लिए सीधी चुनौती
अब गेंद पूरी तरह से *कोरबा जिला प्रशासन* और *संचालनालय लोक शिक्षण* के पाले में है।
1. *तत्काल प्रभाव से निलंबन:* आरोपी प्रधान पाठक को तत्काल प्रभाव से सेवा से बर्खास्त किया जाना चाहिए और उसकी आज तक की गई अवैध वसूली (वेतन-भत्ते) की एक-एक पाई की रिकवरी होनी चाहिए।
2. *हाई कोर्ट में मजबूत पैरवी:* यदि इस मामले में किसी अदालती आदेश की आड़ ली जा रही है, तो जिला प्रशासन को तुरंत अपने विधिक सलाहकारों और वकीलों की फौज खड़ी कर इस आदेश को चुनौती देनी चाहिए और इस फर्जीवाड़े के हर एक किरदार को बेनकाब करना चाहिए।
3. *उच्च स्तरीय जांच:* इस फर्जीवाड़े में शामिल उन तमाम बाबूओं और अधिकारियों की भी पहचान होनी चाहिए, जिन्होंने 17 साल तक इस फर्जीवाड़े पर पर्दा डाले रखा।
यदि जिला प्रशासन इस मामले में अब भी लीपापोती करने की कोशिश करता है, तो यह माना जाएगा कि सिस्टम खुद भ्रष्टाचार के संरक्षकों की ढाल बना हुआ है। कोरबा की जनता और प्रबुद्ध वर्ग अब इस मामले में त्वरित, कठोर और मिसाल कायम करने वाली कार्रवाई का इंतजार कर रहा है।






