BILASPUR NEWS

हे प्रभु मुझे बता दो माया का बंधन तोड़कर तेरे चरणों में कैसे आऊं “बाबा पुरुषोत्तम दास”

बिलासपुर- बाबा मेंहर शाह जी का 13 वां मूर्ति स्थापना दिवस बाबा मैहर शाह दरबार चक्कर भाटा में धुम धाम के साथ मनाया गया इस अवसर पर मैहर शाह दरबार सतना के प्रमुख संत बाबा पुरुषोत्तम दास जी विशेष रूप से बिलासपुर उनका आगमन हुआ रेलवे स्टेशन पर सुबह 8:00 बजे भक्तों के द्वारा ढोल बाजे के साथ फूलों की वर्षा के साथ फूलों की माला पहनाकर स्वागत सत्कार किया गया गाड़ियों का काफिला रेलवे स्टेशन बिलासपुर से निकलकर चक्करभाटा की नगरी पहुंचा यहां पर भी पूज्य सिंधी पंचायत चक्करभाटा के, समाजसेवी बड़ी संख्या में उपस्थित थे इन्होंने बाबा जी के आगमन पर बाबा जी का आतिशबाजी कर,फूलों की वर्षा की गई आरती उतारी गई ढोल बाजे के साथ दरबार साहब पहुंचे बाबा महेंर शाह, जी की मूर्ति पर पुष्प अर्पण कर दीप प्रजवलित करके कार्यक्रम की शुरुआत की गई

सतना से आई भजन मंडली व भाई साहब के द्वारा शबद कीर्तन कार के साध,संगत को नीहाल किया रीवा के मशहूर सिंगर विकास उदासी के द्वारा भक्ति मेंय, कार्यक्रम की शानदार प्रस्तुति दी गई उनके भजन सुनकर भक्तजन झुम उठे इस अवसर पर श्री झूलेलाल मंदिर के संत लाल सांई जी के बड़े सुपुत्र वरुण सांई वह बाबा आनंद राम दरबार सांई कृष्ण दास जी का बाबा महेर शाह सेवा समीति के द्वारा आए हुए दोनों मेहमानों का स्वागत फूलों की माला पहनाकर किया गया सांई कृष्ण दास जी ने अपनी अमृत वाणी में सत्संग की शुरुआत प्रभु के भजन से सिमरन से की उन्होंने एक प्रसंग सुनाया रामायण का गुरु की महिमा कितनी अनंत है वह गुरु के बताए मार्ग पर चलकर ही भक्त भगवान से मिल सकता है और ऐसा ही कुछ प्रसंग में बताया कि आज तक हम लोग भगवान के पीछे जाते हैं भगवान को पाना चाहते हैं भगवान के दर्शन करना चाहते हैं दिन-रात भक्ति सिमरन तपस्या करते हैं पर उसको खुद भगवान खोजते हुए उनके पास पहुंचे यह प्रसंग था रामायण काल का भगवान रामचंद्र जी वनवास के समय जंगलों में गए थे माता सीता जी का हरण रावण ने कर दिया था तो उसकी खोज के लिए भ्राता लक्ष्मण के साथ वन में भटक रहे थे तब किसी ने बताया था कि माता शबरी जी के पास जाइए आगे का मार्ग आपको वही बताएगी माता शबरी के गुरु मतंग ऋषि,अपने सांसारिक यात्रा पूरी करके प्रभु के धाम जाने वाले थे उन्होंने सभी अपने शिष्यो को बुलाया कुछ न कुछ उन्हें दिया पर एक कोने में बैठी माता शबरी उदास रो रही थी उनके गुरु मतंग ऋषि,पहुंचे ओर कहा मैंने सबको कुछ न कुछ दिया है पर तुम्हें कुछ देने के लिए मेरे पास कुछ नहीं बचा है मैं तुम्हें क्या दूं तब माता शबरी जी ने कहा मुझे आप अपना आशीर्वाद दीजिए और आप हमेशा मेरे साथ रहिए क्योंकि आप जब चले जाएंगे तो मैं आपके बिना कैसे रहूंगी आप यहां हो तभी तो मैं सेवा करती हूं आपको देखकर ही तो जिंदा रहती हूं और अगर आप जा रहे हो तो मुझे भी अपने साथ ले चलिए आप जहां जाएंगे में वही आपकी सेवा करूंगी तब उनके गुरु ने प्रसन्न होकर उनके माथे पर हाथ रखा और कहा अभी तुम्हारा समय नहीं है मेरे साथ चलने का पर एक महत्वपूर्ण कार्य पूरा होने के बाद तुम मेरे पास आ जाओगी, और जो लोग👫👬👭 भगवान को पाने के लिए , तरसते हैं वही भगवान तुम्हें खोजते हुए तुम्हारे पास पहुंचेंगे इस तीनों लोक के पालनहार प्रभु विष्णु के अवतार भगवान श्री रामचंद्र जी भाई लक्ष्मण के साथ इस कुटिया में आएंगे उनके दर्शन के बाद ही तुम अपनी सांसारिक यात्रा पूरी ,कर प्रभु के चरणों में ऊपर आ जाना माता शबरी प्रतिदिन कुटिया की साफ,सफाई करती जिस मार्ग से प्रभु आने वाले थे उस मार्ग की सफाई करती फूलों की वर्षा करके रखती ताकि प्रभु आए तो फूलों पर चलकर होकर आए समय बीतत गया अब वह घड़ी भी आ गई जब प्रभु के दर्शन होने वाले थे प्रभु भी उस गांव पहुंचे जिस गांव में नगर में एक से बढकर एक बड़े-बड़े संत महात्मा रहते थे और प्रभु ने माता शबरी की कुटिया कहां है पूछते हुए वहां पहुंचे और माता शबरी बाहर खड़ी, थी तो देखा कि दो लोग गेहूंवा कपड़े पहने आ रहे हैं और जैसे वह अंदर आने लगे तो उन्होंने कहा इस पर मत चलिए इस पर मेरे प्रभु राम आएंगे तो यह बात सुनकर प्रभु राम मुस्कुराने लगे

भाई,लक्ष्मण ने कहा माता जी यही प्रभु श्री राम है तो शबरी के आंखों से आंसू बहने लगे और खुशी के मारे झूम उठी और कहने लगी ,मेरी झोपड़ी में आज राम आ गए ,मेरी झोपड़ी में आज राम आ गए मेरे भाग खुल गए और उन्हें झोपड़ी में ले गई और एक-एक बेंर को चख कर देखती ओर जो मीठा है उन्हें प्रभु को देने लगी खाने के लिए और जो कड़वा है वह फैकती गई यह देखकर लक्ष्मण बोले अपने भाई राम से कि आप तो कहते थे कि झूठा किसी का नहीं खाना चाहिए पर आप तो यहां झूठा बेर खा रहे हैं शबरी के तो रामचंद्र जी ने कहा भाई तुम्हें झूठे बेर दिखाई दे रहे हैं पर उसके पीछे भाव दिखाई नहीं दे रहा है प्रसंग का तात्पर्य है कि गुरु के ही संघ से गुरु के ही दिखाएं वह मार्ग से आपका उद्वार हो सकता है आपका जीवन सफल हो सकता है यह लोक के साथ-साथ परलोक भी आपका सवर सकता है इसीलिए गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिए माता-पिता का कहना मानना चाहिए तभी आपका जीवन सफल होगा

अब वह घड़ी आ गई जिसको सभी को इंतजार था सभी साध संगत को इंतजार था तो सब बहुत देर से बैठी थी अमृतवाणी सुनने के लिए बाबा पुरुषोत्तम दास जी ने सत्संग आरंभ करने से पूर्व गुरु का नाम लिया प्रभु का नाम लिया वह अमृतवाणी में भजन भक्तो को सुनाया और उन्होंने एक कथा सुनाइ उस कथा में भी भाव गुरु वह भक्त था उन्होंने बताया कि

गाँव में एक लकड़हारा था जो प्रतिदिन जंगल जाता था लकड़ीयां काटकर आता था और लकडियां बेचकर जो पैसे मिलते थे अनाज खरीदना था और अपना जीवन यापन करता था प्रतिदिन उसका नित्य नियम यही था एक दिन वह जंगल जाता है लकड़ी काटने तो ,एक पेड़ के नीचे महान विधवान, साधू बैठे रहते हैं और तपस्या करते रहते हैं जैसे उनकी आखे खुली तो अपने तरफ बुलाते हैं और पूछते हैं कौन हो तुम और कहां जा रहे हो क्या करते हो साधू,जी में एक गरीब लकड़हारा हूं पास के गांव में रहता हूं प्रतिदिन लकड़ीयां काटकर ले जाकर बाजार में बेजता हूं और अपना जीवन यापन करता हूं जो पैसे मिलते हैं उनसे समान लाता हूँ साधु ने कहा मैं तुम्हें एक बात बताना चाहता हूं इसमें तुम्हारा बहुत फायदा होगा , उस लकड़हारा ने कहा अभी मुझे देर हो रही है कल मैं आऊंगा तो आपकी बात जरूर,सुनूगा वो लकडहारा ने जल्दी-जल्दी लकड़ी काटकर, साधु,को प्रणाम करके चल पड़ा अपने गांव वापस लकड़िया बैचने के लिए दूसरे दिन फिर जंगल आया और उस संत महात्मा ,के पास पहुंचा और कहां आज मैं आपके पास आया हूँ आपकी बात सुनूंगा और मुझे बताइए कौन सी बात आप मुझे बताना चाहते थे जो मेरे फायदे की है उस साधु संत महात्मा ने कहा कि तुम जो लकड़ी काटने जाते हो जंगल में थोड़ा उससे और आगे जाओ तो तुम्हारा भला होगा साधु की बात मानकर जंगल में और अंदर घुसा तो उसे आगे तांबे की खदान मिली और खुश हो गया और तांबा पोर्टली में भरकर वापस आया साधु को प्रणाम करके गांव पहुंचा और तांबा बेचकर एक हफ्ते का राशन भरकर आराम से खाता रहा एक हफ्ते बाद फिर वापस आया साधु ने पूछा अब वापस कैसे आ गए उन्होंने कहा जो तांबा था खत्म हो गया फिर लेने आया हूं साधु ने कहा उस तांबे कि खदान से और आगे जो तुम्हारा भला होगा वह लकड़हारा उस तांबे की खदान से और आगे गया तो उसे चांदी की खान मिली लकड़हारा खुश हो गया अब तो मैं महीना भर बैठकर खाना खाऊंगा, चांदी भरकर पोटली में आगे गया साधु को प्रणाम करके गांव चला गया,चांदी बेचकर महीने भर का राशन भरकर आराम से महीना भर खाते रहा ,फिर एक महीने के बाद आया फिर साधु ने पूछा उसने कहा चांदी लेने जा रहा हूं और साधु ने कहा और चांदी कि खान से भी आगे जाकर देखो तुम्हारा भला होगा फिर लकड़हारा जब चांदी की खान से आगे गया तो सोने की खान मिली वह और खुश हो गया कि अब तो मैं साल भर बैठकर खाना खाऊंगा सोना, उठाकर पोटली भरकर फिर साधु को प्रणाम करके गांव पहुंचा और सोना बेचकर 1 साल तक राशन भर ,के खाना, आराम से खाता रहा 1 साल के बाद फिर पहुंचा जंगल🌲 उसी 🌳पेड नीचे फिर साधु बैठा हुआ था फिर साधु ने पूछा तो लकडहारा,ने कहा सोना लेने जा रहा हूं साधु ने कहा उस सोने की खदान,के आगे भी जाओ तुम्हारा भला होगा जब लकड़हारा उस सोने की खदान के आगे पहुंचा तो उसे हीरे की खदान मिली और वह एकदम खुशी के मारे पागल हो गया था कि अब तो मेरी सारी जिंदगी कट जाएगी लेकिन फिर भी मुझे पैसे की कमी नहीं होगी वह पूरी पोटली में भरकर हिरे साधु को प्रणाम करके वापस गांव पहुंचा और हीरे बेचकर राशन भरकर सुख सुविधा के सामान भरकर उस झोपड़ी को पक्का मकान बनाकर आराम से रहने लगा समय बितता गया एक दिन रात को उसको अपनी दिल से अंतरात्मा की आवाज आई की है लकड़हारा , तुम भौतिक सुखों के लिए भटक रहा था और जो तुम्हें मिल गया तो उसका आनंद ले रहा है इस भौतिक सुख के आगे भी एक बड़ा सुख है जो तुम्हें मिला नहीं वह प्रभु का नाम वह प्रभु की भक्ति से बड़ा कोई सुख नहीं है और तू इस मायावी सुख में फंसा पड़ा है लकड़हारे की नींद खुली तुरंत सब घर बार हीरे छोड़कर जंगल की ओर चल पड़ा देखा तो जिस 🌴 के नीचे साधु बैठा था वहां साधु नहीं था वह आगे बड़ा तांबे की खान चांदी की खान सोने की खान हीरे की खदानें पार करते हुए जब पहुंचा तो आगे में साधु बैठा हुआ था साधु के चरणों में पहुंचा और बोला मैं समझ गया असली सुख सच्चा सुख तो आपके चरणों में है मुझे यही चाहिए मुझे और कुछ नहीं चाहिए अब मैं कहीं नहीं जाऊंगा तो साधु ने कहा मेरे से और आगे जो परमात्मा बैठे हैं उनके जाकर चरणों में बेठ सुख वही मिलेगा लकड़हारा ने कहा अब आगे नहीं जाऊंगा मैं आपके चरणों में ही रहूंगा इस कहानी का भी तात्पर्य है कि गुरु के द्वारा ही आपको भगवान की प्राप्ति हो सकती है और आज के लोग जिस भौतिक सुख के लिए पीछे पड़े रहते हैं दिन-रात पाप करते रहते हैं झूठ बोलते रहते हैं वह भौतिक सुख तनिक क्षण के लिए काम आएगा जीवन भर वह मरण के बाद भी जो चीज काम आएगी वह भगवान का नाम भक्ति व सिमरन ही काम आएगा और ऐसा सुख कहां मिलेगा

गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलकर ही मिलेगा और बड़े भाग्यशाली हो आप प्रभु कृपा होती है तब लोग सत्संग में पहुंचते हैं और जब गुरु की कृपा होती है तब सत्संग में पहुंचकर उनकी बातों को सुने उस पर अमल कर आप आत्मा को परमात्मा से मिला सकते हो सतसंग में आना ही काफी नहीं है सत्संग में जो एक-एक अमृत वचन हीरे मोती से भी महंगे अमृतवाणी जब कोई संत महात्मा गुरु बताते हैं तो जब आप उसका रसपान करेंगे वह उस पर अमल करेंगे तभी आपको इस सत्संग का लाभ होगा और बड़े भाग्यशाली हैं कि आपकी नगरी में संत महात्मा आए हैं

जब भी कहीं भीआप सत्संग में जाते हैं तो शांति से कहीं पर भी जहां पर जगह मिले चुपचाप बैठ जाएं वह सत्संग को ग्रहण करें तभी सत्संग का लाभ होगा वरना कई लोग तो सिर्फ खाने के लिए आराम से बैठने के लिए घर से परेशान होकर सत्संग में पहुंचते हैं उन लोगों का भला नहीं हो सकता है सत्संग में आने का मतलब खाना खाना या पंखा कूलर के नीचे बैठना ही नहीं होता है सत्संग में आने का मतलब है अपनी आत्मा को परमात्मा से मिलने के लिए आप पहुंचे हो कुछ पुण्य कर्म किए हो तभी आप सत्संग में पहुंचे हो उस क्षण का उस समय का लाभ उठाएं ना कि आपस में बात करके , इस समय को गवाएं कार्यक्रम के आखिर में गुरु को भोग लगाया गया गुरु का वचन सुनाया गया अरदास की गई केक काटा गया भोग लगाकर संत जनो को खिलाया गया आए हुए सभी भक्तजनों के लिए प्रभु का प्रसाद आम भंडारे का आयोजन किया गया बड़ी संख्या में भक्त जनो ने भंडारा ग्रहण किया इस अवसर पर वरुण सांई व सांई कृष्ण दास जी के द्वारा बाबा पुरुषोत्तम दास जी का स्वागत सत्कार किया गया बाबा जी के द्वारा भी दोनों का, स्वागत सत्कार किया गया इस पूरे आयोजन,को सफल बनाने में बाबा मेहर शाह दरबार सेवा समिति चक्करभाटा ओर वाधवानी,,नागदेव परिवार के सभी सदस्यों का विशेष सहयोग रहा

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