वन विद्यालय परिसर खुले में पड़े सैकड़ों बोरी सीमेंट बनी पत्थर,विभागीय उदासीनता का प्रत्यक्ष प्रमाण,जिम्मेदार मौन !
शासन के लाखों के नुकसान की भरपाई आखिर कैसे ?

जगदलपुर । जगदलपुर गीदम रोड स्थित वन विद्यालय के प्रांगण में सैकड़ों सीमेंट की बोरियां लंबे समय से पड़ी-पड़ी पत्थर में तब्दील हो चुकी हैं। यह स्थिति केवल निर्माण सामग्री के खराब होने का मामला नहीं, बल्कि विभागीय लापरवाही और उदासीनता का गंभीर उदाहरण प्रतीत होती है। सवाल यह है कि शासन के लाखों रुपये की इस सामग्री की बर्बादी के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब इस मामले को लेकर जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल किए जा रहे हैं, तो कोई भी इस विषय पर स्पष्ट रूप से बोलने को तैयार नहीं है। वन विद्यालय के प्रभारी हों या संबंधित एसडीओ, सभी इस मुद्दे पर जवाब देने से बचते नजर आ रहे हैं। यदि वास्तव में लापरवाही हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय करना विभाग का दायित्व है।
सरकारी धन जनता के टैक्स से आता है। इसलिए सरकारी सामग्री की बर्बादी को महज एक सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सैकड़ों सीमेंट की बोरियों का उपयोग समय पर नहीं हुआ और वे खराब होकर अनुपयोगी हो गईं, तो इसकी जांच होनी चाहिए कि सामग्री कब खरीदी गई, किस कार्य के लिए लाई गई, उसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी किसकी थी और इतने लंबे समय तक उसका उपयोग क्यों नहीं किया गया।
मीडिया प्रतिनिधियों द्वारा जब इस मामले में वन विद्यालय के प्रभारी और एसडीओ से चर्चा कर उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया, तो कथित तौर पर उन्होंने इस विषय पर कुछ कहने से इनकार कर दिया। जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारियों का मौन इस पूरे मामले को और गंभीर बना देता है। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर सरकारी धन की इस कथित बर्बादी का जवाब कौन देगा?
ऐसे मामलों में केवल सामग्री के नुकसान का आकलन पर्याप्त नहीं है। शासन को यह भी तय करना चाहिए कि लापरवाही किस स्तर पर हुई और इसके लिए कौन अधिकारी या कर्मचारी जिम्मेदार है। यदि जांच में लापरवाही प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए और शासन को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई की प्रक्रिया भी निर्धारित होनी चाहिए।
वन मंत्री को इस मामले में तत्काल संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच के निर्देश देने चाहिए। जांच के माध्यम से पूरे मामले की वास्तविकता सामने आनी चाहिए और यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
सरकारी संपत्ति जनता की संपत्ति है। इसकी बर्बादी पर चुप्पी साध लेना किसी समस्या का समाधान नहीं है। जरूरत इस बात की है कि विभाग पारदर्शिता के साथ जवाब दे—सीमेंट की बोरियां क्यों खराब हुईं, लाखों रुपये का नुकसान कैसे हुआ और इस नुकसान की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
जवाबदेही तय होगी तभी सरकारी धन की ऐसी बर्बादी पर रोक लग सकेगी।























































