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खैरागढ़ में मिला लुप्तप्राय सफेद गिद्ध: 90 के दशक में लगभग 40 लाख गिद्ध भारत में थे; अभी सिर्फ 4-5 हजार

दुर्ग-भिलाई और अंजोरा के पक्षी विशेषज्ञों ने हाल ही में खैरागढ़ क्षेत्र में सफेद गिद्ध इजिप्शियन वल्चर को खोजा है। सफेद गिद्ध को घोसला के साथ टावर में देखा गया है। सफ़ेद गिद्ध पुरानी दुनिया का गिद्ध है जो पहले पश्चिमी अफ़्रीका से लेकर उत्तर भारत, पाकिस्तान और नेपाल में काफ़ी तादाद में पाया जाता था किन्तु अब इसकी आबादी में बहुत गिरावट आई है और इसे अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने संकटग्रस्त घोषित कर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार 90 के दशक में लगभग 40 लाख गिद्ध भारत में थे, जो कि 12 लाख टन मांस को वार्षिक दर से समाप्त किया करते थे। अभी 4-5 हजार ही बचे हैं। पक्षी विशेषज्ञों मैत्री कालेज आफ डेंट्रिस्ट्री एंड रिसर्च सेंटर, अंजोरा के लेक्चरर बायोकेमिस्ट्री विभाग शरित शेखर बर्मन और सीनियर टेक्नीशियन ईश्वरकुमार पटेल, मर्चेंट मिल, भिलाई इस्पात संयंत्र ने दुनिया भर से विलुप्त हो रही सफेद गिद्ध को खैरागढ़ क्षेत्र में ढूंढ निकाला है। उन्होंने बताया कि साल 2005 में गिद्धों की तबाही के बाद की बात है, हम भाग्यशाली थे कि बेरला ब्लॉक, दुर्ग जिले में 11 सफेद गिद्ध देखे गए।

खैरागढ़ के एक गांव में पावर ट्रांसमिशन टावर पर दिखा घोंसला
टीम ने मार्च 2021 में राजनांदगांव जिले के कुछ हिस्सों का दौरा किया। टीम में पक्षी विशेषज्ञ अखिलेश भरोस, कान्हा किसली, जागेश्वर वर्मा, रायपुर और अनूप नायक भिलाई से शामिल थे। खैरागढ़ से कुछ किमी पूर्व एक गांव में एक घोंसला देखा। मुख्य सड़क से कुछ दूरी पर खेत पर स्थित पावर ट्रांसमिशन टावर पर यह दिखा। खेत मालिक लखनलाल साहू ने एक छोटा सा घर बनाया था। जमीन से 15 मीटर की ऊंचाई पर बना एक घोंसला देखा। घोंसला पिछले 3 से 4 वर्षों से इस टावर पर विद्यमान है। हर साल किसी पक्षी द्वारा घोंसला बनाया जाता है। उसी समय टीम ने देखा कि सफेद गिद्ध घोंसले के करीब पहुंच रही है और उसे उतरते हुए देखा।

खेत मालिक को बताया कि यह चील नहीं गिद्ध है। संपर्क बनाए रखा और समय-समय पर जानकारी भी एकत्र की। कोविड-19 महामारी के कारण लॉकडाउन लागू होने के कारण साइट का दौरा 29 और 30 मई 2021 को किया गया। इस समय तक चूजा बड़ा हो गया था। 30 जून 2021 को देखा गया कि गिद्ध घोंसला छोड़कर जा चुके थे। 21 फरवरी को साइट का पुनरीक्षण किया गया और एक गिद्ध टावर पर पाया गया उनमें से एक घोसले के अंदर था। हमारे अध्ययन का विषय था, एक ही स्थान पर बार-बार घोंसले बनाने की पुष्टि करना और उसका उपयोग करना, साल दर साल वही घोंसला दिखा। उन्होंने न केवल गिद्धों को ढूंढ निकाला बल्कि गिद्धों के संदर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी भी एकत्र की है। यह कार्य उन्होंने छत्तीसगढ़ के पक्षी विशेषज्ञ एएमके भरोस, रायपुर के मार्गदर्शन में किया। उनके लिखे आर्टिकल को नेशनल केव रिसर्च एंड प्रोटेक्शन, इंडिया ने अपने एंबिएंट साइंस जर्नल में प्रकाशित किया है।

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