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हमारी शास्त्रीय कलाओं के इतिहास में बहुत कम हुआ है कि कोई कलाकार और कला पर्यायवाची हो जाएं

अशोक वाजपेयी
संसार और साहित्य

अमरीकी साहित्यकार सूसन सौंटाग का दशकों पहले लिया गया पुस्तक-पर लम्बा इंटरव्यू हार्पर कालिन्स ने ‘दि कम्प्लीट रोलिंग स्टोन इंटरव्यू’ शीर्षक से प्रकाशित किया है. उसका समापन करते हुए, 138वें पृष्ठ पर सौंटाग कहती हैं: ‘मैंने पहले कहा है कि लेखक का काम संसार का ध्यान देना है पर ज़ाहिर है कि मैं ये भी सोचती हूं कि लेखक का काम, जैसा कि मैं अपने लिए सोचती हूं, यह भी है कि वह हर तरह के झूठ के साथ आक्रामक, विरोधी रिश्ते में हो… और फिर एक बार, यह अच्छी तरह से जानते हुए कि यह कभी न ख़त्म होनेवाला काम है क्योंकि आप कभी झूठ को, झूठी चेतना या व्याख्या की व्यवस्था को समाप्त नहीं कर सकते. लेकिन किसी भी पीढ़ी में कुछ ऐसे लोग होने चाहिये जो इन चीज़ों पर प्रहार करें….’

आज तो सारा संसार झूठों के एक विश्वव्यापी राज्य में रह रहा है. पहले के मुक़ाबले अब झूठ इतनी तेज़ी से फैलते-फैलाये जाते हैं कि कई बार तो सच के लिए जगह बच पाना तक असम्भव हो जाता है. झूठ के पास हमेशा साधनों की बहुतायत रही है. हमारे समय में तो, भारत में, इन सभी साधनों पर झूठ और झूठ के व्यापारियों का एकाधिकार सा हो गया है. लेखक का एक कठिन लेकिन ज़रूरी काम यह है कि वह झूठों के इस घटाटोप में सच की जगह बनाए और बचाये. और जो करते हैं करें, कम से कम लेखक का नैतिक कर्तव्य इस समय सच के साथ खड़े होना है और लगातार दृश्य पर सच का दबाव बनाना है. पहले के मुक़ाबले आज कहीं अधिक साहित्य को सत्याग्रह होना चाहिये: किसी आन्दोलन के रूप में उतना नहीं जितना सत्व और तत्व के रूप में.

यह सचाई बहुत मनोबल बढ़ाती है कि, सारे प्रलोभनों और जोखिमों के बावजूद, हमारे समय का महत्वपूर्ण साहित्य और उसके लेखक झूठ-हिंसा-घृणा-धर्मान्धता-साम्प्रदायिकता के पाले में नहीं गये हैं. उन्होंने हिन्दी के उदात्त-उज्ज्वल उत्तराधिकार को ज़िम्मेदारी और समझ से सम्हाला है. विजयदेव नारायण साही के दशकों पहले स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान लिखे साहित्य को उसके समय को ‘सत्याग्रह युग’ कहा था. शायद इस समय हम सत्याग्रह के दूसरे युग में हैं.

यह नोट करना ज़रूरी है कि अकसर हम राजनीति में झूठ को सामान्य व्यवहार मानते आये हैं. हमारे समय में इस समय झूठ का विशद व्यापार करने में धर्म और मीडिया भी शामिल हो गये हैं. अध्यात्मच्युत धर्म, पालतू-कायर मीडिया इन दिनों झूठों की मनियारी रोज़ सजाते हैं. लेकिन यह भी हमारे ध्यान में नहीं हटना चाहिये कि मानवीय संबंधों, प्रकृति विचार, भाव, रोज़मर्रा के जीवन में ऐसा कुछ लगातार घटता रहता है जो सच है और उसे दर्ज़ करनाऔर साधारण में महिमा देख पाना भी आज साहित्य का कर्तव्य है. इसका एक आशय यह भी है कि जीवन का सच राजनीति-धर्म-मीडिया द्वारा फैलाये जा रहे झूठों से दबाया या नष्ट नहीं किया जा सक रहा है.

बिरजू विलय

कथक में लगभग आधी सदी शिखर पर बहुमान्य बिरजू महाराज का इसी 17 जनवरी 2022 को देहावसान हो गया: इसे कई स्तरों पर कथक में एक युगान्त कहा जा सकता है. अपनी कला की उत्कृष्टता और शक्ति से वे ऐसी ऊंचाई पर पहुंचे कि दशकों तक कोई उनके समकक्ष नहीं आ पाया. कथक के सभी पक्षों पर उनका अधिकार असाधारण था. उनकी परम्परा की समझ और पकड़ उसे आधुनिकता के प्रति खुला और ग्रहणशील बनाती थी. उनके यहां शास्त्रीयता में आधुनिक ऐसे समरस हो गया था कि उनकी शास्त्रीयता आत्मविश्वस्त रूप से समकालीन सहज ही हो जाती थी. उन्हें उचित ही ‘लय का सम्राट’ कहा जाता था. लय को उन्होंने ऐसे साधा था कि वे उसे सूक्ष्म से सूक्ष्म, जटिल से जटिल, लगभग अदृश्य और अश्रव्य बनाकर भी सम्प्रेषणीय बनाये रखते थे. उनके यहां लय की लीला अपनी पूरी विस्तृति और स्फूर्ति में प्रगट होती थी. वे लय से ऐसे खेलते थे जैसे कोई महान् संगीतकार सुरों से खेलता है.

कथक को राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तरों पर प्रतिष्ठित करने में उनकी बड़ी भूमिका थी. समुद्र पार गये वे शायद पहले कथक कलाकार थे और उन्होंने, निश्चय ही, संसार के सबसे अधिक देशों में कथक प्रस्तुत करने का गौरव हासिल किया. कथक में नृत्यनाटिका को एक नयी विधा के रूप में बिरजू महाराज ने ही स्थापित किया. एक गुरु के रूप में दशकों उन्होंने संगीत भारती, भारतीय कला केन्द्र, कथक केन्द्र और कलाश्रम में, सम्भवतः कथक के इतिहास में, संख्या में सबसे अधिक शिष्यों को कथक सिखाया. शिष्य-संख्या के क्षेत्र में शायद समवर्ती अन्य शैलियों के किसी और गुरु ने इतनी संख्या में शिष्य तैयार नहीं किये. दर्शकों के साथ ताल-मेल बैठाने में भी वे बेजोड़ रहे: मंच पर से उनकी उक्तियां इतनी मर्मस्पर्शी और काव्यात्मक होती थीं कि एक कथक विशेषज्ञ ने उनके आधार पर कई शास्त्रीय अवधारणाएं विकसित की हैं.

हमारी शास्त्रीय कलाओं के इतिहास में ऐसा बहुत कम होता है जब किसी कलाकार और उसकी कला परस्पर पर्यायवाची हो जायें. हमारे समय में, नृत्य के क्षेत्र में, ऐसा कम से कम दो बार हुआ है. गुरु केलुचरण महापात्र ओड़िसी के पर्यायवाची हुए और बिरजू महाराज कथक के. व्यापक समाज में ओड़िसी और कथक दोनों इन दोनों मूर्धन्यों के नाम से जाने जाते हैं. सौभाग्य से दोनों ने अपनी शैलियों की ऐन्द्रियता संरक्षित और सघन की जबकि, उदाहरण के लिए, भरत नाट्यम में उसे, अपनी विक्टोरियन दृष्टि से, रुक्मिणी देवी ने किनारे कर शुद्ध बनाने की कोशिश की.

मेरी पत्नी रश्मि (तब जैन) बिरजू जी की सबसे पहली शिष्याओं में हैं. उनसे हमारे पारिवारिक संबंध हमेशा आत्मीय और गरमाहट-भरे रहे. भारत भवन में उन पर एकाग्र ‘बिरजू महाराज प्रसंग’ हमने किया था और पिछले वर्ष रज़ा फ़ाउण्डेशन के ‘युवा-2021’ में एक सत्र उन पर था और वे अस्वस्थ होने के बावजूद आये थे. मेरे बेटे कबीर ने उनके कलाश्रम का स्थापत्य कल्पित किया.

स्थगन

कोरोना प्रकोप की नयी लहर ने रज़ा शती के अन्तर्गत प्रस्तावित कई आयोजनों को स्थगित करने पर विवश कर दिया है. लहर जिस तरह से व्याप और फैल रही है, उसमें ऐसा करना बिलकुल उचित है. फ़रवरी 2022 उनके सौ सालों का आखि़री महीना है और हमने कई, हमारी समझ से, अनूठे आयोजन सोच रखे थे, जगहें बुक कर ली थीं, लोगों को आमंत्रित कर लिया गया था, उनकी यात्राओं और ठहरने आदि की व्यवस्था कर ली थी. सब स्थगित करना पड़ा है और ज़ाहिर है कि यह कई तरह से असुविधाजनक है. पर क्या करें लाचारी है.

फ़रवरी के पहले सप्ताह में रज़ा पुरस्कार से विभूषित कुछ चुने हुए कलाकारों की नयी कलाकृतियों की प्रदर्शनी ‘वर्णिकाभंग’ शीर्षक से त्रिवेणी में शुरू होनी थी जो अब स्थगित है और शायद गर्मियों के बाद ही संभव हो. उस प्रदर्शनी के दौरान कुछ कवितापाठ की भी योजना थी जिसे मुल्‍तवी करना पड़ रहा है. बीकानेर हाउस में किरण नादार कला संग्रहालय रज़ा साहब के चित्रों की एक बड़ी प्रदर्शनी लगाने जा रहा था. अब वह भी विलम्बित होगी. उधर मुम्बई में छत्रपति शिवाजी वस्तु संग्रहालय में रज़ा अभिलेखागार से चुनी हुई सामग्री के आधार पर रज़ा साहब के कविता से संबंध पर एकाग्र एक प्रदर्शनी होनी थी जिसे अब शायद जुलाई में करने की योजना है. पीरामल संग्रहालय रज़ा साहब के आरंभिक दिनों के चित्रों का शायद सबसे बड़ा संग्राहक है: उनकी फरवरी में प्रस्तावित प्रदर्शनी स्थगित है.

इसी बीच, सौभाग्य से, रज़ा साहब की अंग्रेज़ी में यशोधरा डालमिया लिखित जीवनी के मराठी और बांग्ला अनुवाद पूरे होने को हैं. उम्मीद है कि इस वर्ष के उत्तरार्ध में वे प्रकाशित हो जायेंगे. शती समारोह के अन्तर्गत ग्वालियर, भोपाल, पुणे, बड़ोदरा आदि कला केन्द्रों में जो बहुकला उत्सव प्रस्तावित हैं उनमें से शायद एकाध-दो मार्च-अप्रैल में, अगर स्थिति बेहर हो, हो सकते हैं. नोबल पुरस्कार प्राप्त तुर्की कथाकार ओरहान पामुक की यात्रा भी स्थगित है- उन्हें रज़ा व्याख्यान देने आना है.

रज़ा साहब के चित्रों से प्रेरित नयी कोरियोग्राफ़ी, जो मणिपुरी, कथक, सत्रिया, मोहनीअट्टम, भरत नाट्यम, ओड़िसी आदि शैलियों में, कई कलाकार कर रहे हैं अब एक बड़े समारोह में जुलाई या उसके बाद ही प्रदर्शित हो पायेगी. इस बार की रज़ा कविता द्वैवार्षिकी भारतीय भाषाओं के युवा कवियों पर एकाग्र है और वह भी अब उत्तरार्द्ध में ही हो पायेगी. अलबत्ता भारत भर से चुने गये सौ युवा कलाकारों की बृहत् प्रदर्शनी, दिल्ली की पांच कलाविथिकाओं में एक साथ, जो मार्च के अन्त से होना प्रस्तावित है, उम्मीद है, समय पर हो पायेगी.

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