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‘गुरु पूर्णिमा के अवसर पर इंडस पब्लिक स्कूल दीपका नें आयोजित की ऑनलाइन सोशल एक्टिविटी’ – डॉ संजय गुप्ता.

  • गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु, गुरुर देवः महेश्वराः
  • गुरु साक्षात परमब्रह्म तस्में श्री गुरुवे नमः
  • जीवनबन्ध से जीवनमुक्ति, आत्मबोध, आत्मज्ञान स्वयं से रूबरू करवाने अज्ञानता के अंधकार में ज्ञान रूपी प्रकाश द्वारा दीपक जलाने वाला गुरु ही होता है – डॉ संजय गुप्ता आई. पी. एस.
  • माता पिता बच्चों के जीवन के प्रथम शिक्षक जिनसे संस्कारों की नींव बच्चों में पड़ती है – डॉ संजय गुप्ता आई. पी. एस.

प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी 5 जुलाई को इंडस पब्लिक स्कूल परिवार द्वारा गुरु पूर्णिमा मनाई गई फर्क बस यह रहा कि कार्यक्रम वर्चुअल तौर पर डिजिटल मीडिया के माध्यम से ऑनलाइन वेबिनार के द्वारा सम्पन्न हुआ, इस दौरान बच्चों नें गुरु से सम्बंधित सुंदर सुंदर कविताएं, निबंध, भाषण की ऑनलाइन प्रस्तुति की।

इस संदर्भ में जब इंडस पब्लिक स्कूल के प्राचार्य डॉ संजय गुप्ता से चर्चा हुई तब उन्होंने बतलाया कि जैसा कि पुरे भारत वर्ष में 5 जुलाई को गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है जिसका उद्देश्य मनुष्य जीवन मे गुरु की महत्ता को बरकरार रखना है, एक गुरु बच्चों में शिक्षा के बीज रोपित करता है, और जैसा बीज होता है वृक्ष भी उसी तरह होता है फिर फल भी उसी तरह देता है, अपने त्याग समर्पण सेवा भाव से गुरु बच्चों को शिक्षा व संस्कार प्रदान कर जीवन के अनेकों बातों के लिये शिक्षित करता है, एक तरह से देखा जाए तो मनुस्य जिस किसी को फॉलो करता है वह इंडायरेक्टली उसका शिष्य ही होता है, आज के दौर में एक दूसरे के गुणों को देख लोगों में ईष्या द्वेष की भावना पनपने लगती है, जबकि ज्ञान द्वारा गुणों का दान करना सर्वश्रेष्ठ दान महादान कहलाता है, गुरु की राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाता है, जितने समर्पण भावना के साथ गुरु शिक्षा को सेवा समझकर कर्मठता व तन्मयता से निस्वार्थ रूप से शिक्षा प्रदान करता है, शिष्य में उतने ही मजबूत नींव, आधार, फाउंडेशन के निर्माण होता और जितना फाउंडेशन मजबूत उतना मानव जीवन मजबूती से समस्यायों का सामना करते हुवे बीतता है, एक तरह से देखा जाए तो बच्चों की सबसे पहली जो जीवन में गुरु बनती है वह होती है मां जिनके सानिध्य में अधिक समय एक शिशु व्यतीत करता है, जो मां के संस्कारों का उनके भावनाओं का फीलिंग्स का इमोशन्स का बच्चे के व्यवहार, इमोशन्स संस्कार निर्माण में अहम भूमिका अदा करता है, चूंकि मां के सानिध्य में रहकर शिशु सीखता जाता है कि क्या करना है क्या नहीं, कहा चीजे उसके लिये सही हैं क्या नहीं एक एक छोटी छोटी बारीकियां जो कुछ वह मां में देखता है जो कुछ उनके मुख से सुनता है, जो कर्तव्य करते हुवे देखता है, जैसी भावनाएं उसे लगातार मिलती रहती है वह धीरे धीरे वैसा बनता चला जाता है चूंकि मानव का सबकॉन्सियस माइंड जिन चीजों की पुनरावृति होते महसूस करता है, वह उसकी आदत या संस्कार बन जाते हैं, इस तरह से हर घड़ी एक शिशु कुछ ना कुछ सिख ही रहा होता है व सम्पूर्ण जीवन पर्यंत सीखता ही रहता है, चूंकि ज्ञान समुद्र के समान है जिसकी कोई लिमिट नहीं, उसके पश्चात अगर बात करें परम् शिक्षक की तो परमात्मा हम सभी मनुस्य आत्माओं का शिक्षक भी है पिता है सतगुरु भी जो हममे विभिन्न तरह के संस्कार से सींचने के लिये जीवन मे अनेको प्रकार के अलग अलग नाटक की रचना करता है, एक तरह से देखा जाए तो मनुस्य जीवन मे आने वाली समस्याएं भी एक शिक्षक का ही काम करती है, मनुस्य अपने कर्मों के अनुसार परिस्थिति का निर्माण स्वयं करता है फिर उस परिस्थितियों से जब वह विपरीत परिस्थितियों से जब वह गुजरता है तो एक परमात्मा ही है जो सही व गलत राह का आंकलन करने की परख शक्ति देता है, गुरु वह जो अज्ञानी को ज्ञानवान बना दे अंधकार में जी रहे व्यक्ति के जीवन मे ज्ञान से प्रकाश फूंक दे, जीवनबन्ध से जीवन मुक्त करा दे, स्वयं से रूबरू करवाकर अपनी शक्तियों से मिलवा दे चूंकि सबकुछ हमारे अंदर ही है जो उन्हें निखार दे, जो आत्मबोध करवा दे, जो आत्मा ज्ञान दे आत्माभिमानी बना दे वह गुरु ही होता है जो जीवन की नैया को पार लगाने के मार्ग मनुस्य को प्रसस्त करता है।

जो हिम्मत देता है सदमार्ग देता है जिससे हम परिस्थितियों का सामना कर विजय प्राप्त कर उसके अनुभवी बन सके व उस शक्ति को प्राप्त कर सके फिर समाज को उस शक्ति को गुणों को सौंप सके तो इस प्रकार परमात्मा से हर तरह के सम्बंध मनुस्य जोड़कर अपने आप को सदमार्ग पर चला सकता है यह जरूरी नहीं कि विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक ही एकमात्र गुरु हैं ऐसा कहना या ऐसा सोचना अपने अहम को बढ़ावा देना है एक तो हैं परम शिक्षक सतगुरु परमात्मा जो सर्व मनुस्यों के सद्गुरु हैं, फिर धरती माता पिता भी दूसरे गुरु के रूप में ही परमात्मा की देन होते हैं, फिर विद्यालयों के शिक्षक भी एजुकेशन प्रदान कर सींचते हैं फिर समाज मे दोस्त भी हमें तकलीफों से बचाने में मदद कर हमारे सहयोगी बनकर व्यवहार का सही गलत का संस्कार ट्रांसफर होते रहता है, फिर बड़े होने के पश्चात जहां नौकरी करते हैं वहां के बॉस भी गुरु ही होते हैं जिससे हम बहोत कुछ सीखते हैं, तो इस प्रकार से देखा जाए तो जहां कहीं भी मनुस्य को किसी से किसी ज्ञान गुण की प्रालब्ध होती है वहां वह व्यक्ति उसके लिये गुरु का काम कर रहा होता है, भले ही संबंधों में हम उन्हें अलग अलग नाम से पुकारते हैं पर जिस किसीसे हमें कोई सिख मिली संस्कार मिला ज्ञान गुण मिला उसने हमारे जीवन में गुरु का काम किया, आज लोग प्रायः दुश्मन से घबराते हैं क्योकि वह हमारी कमियां गिनता रहता है, जबकि अगर गौर फरमाएं तो दुश्मन भी एक गुरु का फर्ज अदा कर रहा होता है जो हमें हमसे मिलाने आता है, हमें खुद के गुण शक्तियों ज्ञान से रुबरु करवाने आता है, उस प्रकार अगर गौर फरमाएं की मनुस्य आत्मा में गुण विद्धमान होते हैं बस जीवन मे सम्बन्धित परिस्थितियां आने पर सम्बन्धित गुण, ज्ञान प्रत्यक्ष होने लगते हैं।

आजकल तो डिजिटल युग में सोशल मीडिया जिससे अनेकों प्रकार के इन्फॉर्मेशन मनुस्य को प्राप्त हो रहे हैं, सब एक दूसरे के व्यक्तित्व की देखा देखी कॉपी कर रहे हैं इस तरह से आपस मे संस्कारों का ट्रॉन्फॉर्म हो रहा है तो वहां भी लोग सिख ही रहे हैं अब यह व्यक्ति विशेष की मन्सा पर निर्भर करता है कि वह पोसिटीवे इन्फॉर्मेशन ले रहा है या नेगेटिव चूंकि जैसा इन्फॉर्मेशन वह लेगा उसका मन वैसा ही चलेगा, तभी तो कहा गया है जैसी संगत वैसी रंगत सनज का रंग लगता है, आजकल कोई किसी टीवी एक्टर का क्रिकेटर का वक्ता का नेता का या किसी इतिहास के महापुरुष का भी अगर कोई फॉलोवर है तो वह उनके गुरु ही हुवे चूंकि उनके व्यक्तित्व को वह अंदर ही अंदर कॉपी कर रहा होता है, देखा जाए तो सारा खेल ही संस्कारों का है अच्छे के संगत से अच्छा तो बुरे के संगत से बुरा बनना मनुस्य के मन की प्रवित्ति है उसे जैसा माहौल वातावरण मिलता है वह उस अनुसार अपने को ढाल लेता है।

तो बच्चों के मन मे गुरु के प्रति सम्मान की भावना बरकरार रखने के लिए आज इंडस पब्लिक स्कूल परिवार नें गुरु पूर्णिमा के अवसर पर ऑनलाइन सोशल एक्टिविटी का आयोजन किया था जिसमे बच्चों ने गुरुओं के लिये भाषण कहें, तो किन्ही नें कविताएं, निबन्ध प्रस्तुत किये, तो किसीने चित्रकला प्रदर्शित की तो वहीं सभी बच्चों को यह संस्कार दिया गया कि सुबह उठकर सर्वप्रतम परमात्मा का सुकराना अदा करें जो उन्होंने हीरे तुल्य मनुस्य जीवन दिया, फिर माता पिता व घर के बड़े बुजर्गों को प्रणाम कर उनका आशिर्वाद लेना चाहिए फिर स्कूल में शिक्षकगण का हमारे आसपास के सभी पहचान वालों का अभिवादन करना चाहिए उनसे उनके जीवन के अनुभव लेने चाहिए।

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