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नारायणपुर जिला में सुलगने लगा – ग्रामीण आंदोलन सिलगेर आंदोलन की तर्ज पर. फोर्स के स्थापित हो रहे कैंप के विरोध में लामबद्ध हुए ग्रामीण।

 

नारायणपुर जिला में सुलगने लगा – ग्रामीण आंदोलन
सिलगेर आंदोलन की तर्ज पर. फोर्स के स्थापित हो रहे कैंप के विरोध में लामबद्ध हुए ग्रामीण।  नारायनपुर जिला के ओरछा क्षेत्र के ग्राम होड़नार और मदोनार में १ जनवरी २०२३ से धरने पर बैठे हैं सैकड़ों ग्रामीण ,बस्तर संभाग में अलग अलग जिले में नक्सलियों का खात्मा या नक्सल गतिविधियों में नियंत्रण के लिए जगह जगह स्थापित किए जा रहे सुरक्षा बलों के कैंप का संबंधित क्षेत्रों के ग्रामीणो द्वारा पुरजोर विरोध किया जाने लगा है। पिछले वर्ष बीजापुर जिला के सिलगेर गांव में इस तरह का विरोध उग्र आंदोलन का रुप ले चुका था, जहां आज भी ग्रामीणों की हलचल जारी है, उसी तर्ज पर अब घोर नक्सल प्रभावित जिला नारायनपुर के‌ ग्राम होड़नार व मदोनार के ग्रामीणो ने भी कमर‌कस कर धरने में बैठकर अपना विरोध आरंभ कर दिया है।

1 जनवरी 2023 से ग्राम होड़नार और मदोनार के सेकड़ो ग्रामीण फोर्स के कैम्प के विरोध में अनिश्चित कालीन धरने पर बैठे हैं।
धरने में बैठे ग्रामीणों का कहना है कि फोर्स कैम्प के जवान, जंगल में जाने वाले गांव के बेकसूर ग्रामीणों को नक्सली बता कर मार् देते हैं या गिरफ्तार कर लेते हैं । यहां हम सैंकड़ों सालो से जंगल से होने वाले संसाधनों पर ही जीते है, जैसे महुआ बास्ता, चार, गोंद, शहद आदि ही हमारे आय के साधन हैं। अगर हम जंगल ही नही जा सकेंगे तो जियेंगे कैसे? लेकिन ये डर हमेशा बना रहता है कि अगर हम जंगल जायेगे तो फोर्स के लोग हमे उठा के ले जाएंगे और ले जाते ही हैं। हम विकास के विरोधी नहीं हैं और न ही सुरक्षा गतिविधियों के। लेकिन हमारे प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करते हुए आधुनिक विकास के नाम पर /नक्सल गतिविधियों पर लगाम लगाने के नाम पर हम जंगल वासियों का ही शोषण व‌ खात्मा केन्द्र की मोदी सरकार व छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार के द्वारा लगातार तीव्रता से किया जा रहा है। सरकार के‌ नेता व अधिकारी, एक ओर वनोपजो का अधिक मूल्य घोषित कर वाहवाही भी लूट रहे हैं और दूसरी तरफ जगह जगह जंगलों में, फोर्स की तैनाती कर हमें जंगल में वनोपज संग्रह से रोकने का कुचक्र भी रचा गया है, जिससे मजबूर होकर हम स्वयं और हमारे बच्चे अन्य प्रदेशों में रोजगार हेतु व स्वयं को सुरक्षित रखने यहां से पलायन करने लगे हैं। हमारे जंगलों व पहाड़ों में फोर्स को तैनात कर, यहां की प्राकृतिक संसाधनों को औद्योगिक कंपनियों को लीज में देकर सिर्फ हमारा शोषण किया जा रहा है। हमारा स्वभाव आंदोलनकारी नही है, हम सीधे सादे प्रकृति प्रेमी आदिवासी हैं,
हम जंगल के निवासी आंदोलन की राह में आने को मजबूर हुए हैं।
हमारा विरोध हमारी प्रकृति के संरक्षण के लिए है। हमारा विरोध हमारी ग्रामीण संस्कृति को बचाए रखने के लिए है। हमारा विरोध फोर्स की आड़ में बर्बाद हो रही हमारी स्वच्छंद प्राकृतिक जीवनशैली को बचाने के लिए है। हमारा विरोध बेकसूर ग्रामीणों पर सरकारों की दमनकारी नीतियों के लिए है। हमारे क्षेत्र में फोर्स का कैंप स्थापित नहीं करने देंगे। हमारे संवाददाता से बातचीत में फोर्स पर आरोप लगाते हुए इन ग्रामीणों ने यह आरोप लगाया है कि अभी धरने‌ में बैठे जाने के दौरान हमारे अनेक साथियों को नक्सली गतिविधियों में शामिल बताकर जेल में डाल दिया गया है, और कुछ ग्रामीणों का तो अता पता ही नहीं है, उन्हें नक्सली बताकर कहीं गोलियों का शिकार न बना दिया जाए।
अब देखना यह है कि इस विरोध व धरना के प्रतिक्रिया स्वरुप प्रशासन व क्षेत्र में तैनात फोर्स इन ग्रामीणों की मांग पर सुलह व‌ बातचीत का कितनी जल्दी व कौन सा रास्ता अपनाती है?
अन्यथा सिलगेर आंदोलन की तरह आरंभ हुए इस विरोध के स्वर/ नारायनपुर के जंगलों में गूंजने लग सकते हैं।

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